उत्तराखंड की रावत सरकार से नहीं मिला न्याय, बिना किसी ठोस आधार के जेई भर्ती करावा दी रद्द , सीबीआई जाँच की मांग

देहरादून, August 19, 2019: एक समाचार पत्र  में छपी न्यूज़ के अनुसार  उत्तराखंड सरकार की एनर्जी सचिव राधिका झा ने जेई भर्ती रद्द करने के आदेश  दे दिए है. अभ्यार्थियों का कहना है कि बिना किसी ठोस आधार व् सबूत के उत्तराखंड सरकार ने 252 जेई  पदों के लिए पिटकुल/यूपीसीएल के  चयन को निरस्त कर इस प्रकरण में अपनी मिलीभगत साबित की है. इन अभ्यार्थियों का मानना है कि इस मामले की जाँच में उत्तराखंड सरकार गंभीर नहीं है और एक सुनियोजित तरीके से पूरी चयन परिक्रिया को रद्द कर इन युवाओ के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर इनको डिप्रेशन में धकेल रही है.  

दो वर्ष से चल रहे इस मामले में अबतक के घटनाक्रम को गंभीरता से समझने की जरुरत है जिमसे हरिद्वार के डीएम दीपक रावत की भ्रमित करने वाली रिपोर्ट, माननीय उत्तराखंड उच्तम न्यायलय के जज का ट्रांसफर, उत्तराखंड सरकार के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत जी का अभ्यार्थियों को मिलने का जरुरी समय न देना, देहरादून के अखबारों द्वारा अभ्यार्थियों की प्रेस वार्ता की न्यूज़ न कवर करना, एनर्जी सचिव राधिका झा का मामले को इंडिपेंडली एक्सामिन न करके अधीनस्थ चयन आयोग और हरिद्वार के डीएम की रिपोर्ट का हवाला देकर जेई भर्ती रद्द करने का निर्णय लेना  (न्यायालय द्वारा यह कहा गया था की अभ्यार्थियों को पूर्ण रेप्रेजेटेंशन मिले व् एनर्जी सचिव मामले को इंडिपेंडली एक्सामिन करके निर्णय ले), जेई भर्ती रद्द करने के निर्णय व् आदेश की ऑफिसियल (जानकारी), कॉपी सार्बजनिक होने से पहले अख़बार में घपला बताकर न्यूज़ छपना, और अब अभ्यार्थियों को धरना प्रदर्शन की परमिशन दिए बिना देहरादून के डीएम का अचनाक  छुट्टी पर जाना। हे सभी क्रमवाइज घटना चक्र सरकार की मिली-भगत को दर्शता है जो लोगो की उम्मीद के खिलाप है और जो उत्तरखंड की इन्ही जनता द्वारा एक भारी बहुमत से चुनी हुई लोकतान्त्रिक सरकार को शोभा नहीं देता।

माननीय उत्तराखंड उच्तम न्यायलय के आदेश के बाबजूद इन चार महीनो में अभ्यार्थियों का पक्ष सुना नहीं गया ,कोई निष्पक्ष जांच नहीं हुई और पिछली जाँच में किसी को दोषी नहीं पाया गया. न तो उनको जिन्होंने मॉडरेशन किया,(परीक्षा प्रश्न सेट करने वाले प्रेक्षकों को  प्रशासन द्वारा मोबाइल फ़ोन इस्तेमाल किये जाने पर प्रतिबंद कभी नहीं रहा तो अब यह आलाप क्यों) न कोई  आयोग से,न कोई कोई अभ्यर्थी और न अन्य कोई दोषी पाया गया। तो उत्तराखंड के पढ़े लिखे इन  युवाओ के साथ यह अन्याय किस आधार हो रहा है? 

सिर्फ निराधार शक या भ्रम की वजय से इतनी बढ़ी प्रक्रिया जिसमें उत्तराखण्ड के अलग अलग  गांव व् शहरो से २५२ युवा  व् युवतियों का पूर्ण भविष्य  दाव पर लगा हो , कैसे निरस्त कर सकते है? 

अभ्यार्थियों की मांग है सरकार जबाब दे। सीबीआई से जाँच करवाए और न्याय करे. 

(इस लिंक पर क्लिक कर  सुने इन अभ्यर्थि यों  के दर्द व् बेदना को और इस को शेयर करेताकि इनकी आवाज प्रधान मंत्री व् जनता तक पहुंचे  )


माननीय उत्तराखंड उच्तम न्यायलय के आदेश की ऑफिसियल कॉपी का आखिरी पन्ना 



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