Posts

मर्यादा, परिवार और कानून: नई पीढ़ी के भटकाव और सामाजिक क्रूरता पर एक गंभीर समीक्षा

Image
  ( पितृत्व दिवस (Father's Day   पर बच्चों और समाज के नाम एक विशेष लेख ) हाल ही में उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में घटित केतन लाल हत्याकांड ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को किस दिशा में ले जा रहे हैं। बच्चों के सुरक्षित भविष्य, सामाजिक मर्यादा, कानून और मानवीय मूल्यों को ध्यान में रखते हुए इस पूरे मामले और सामाजिक परिदृश्य का एक विस्तृत विश्लेषण नीचे प्रस्तुत है: 1. चरित्र निर्माण में माता-पिता और परिवार की भूमिका एवं जिम्मेदारी मनोवैज्ञानिकों और सामाजिक अध्ययनों के अनुसार, बच्चों के चरित्र निर्माण और मानसिक विकास में माता-पिता तथा परिवार की भूमिका व जिम्मेदारी सबसे अधिक होती है: ·        प्रथम पाठशाला है परिवार: बच्चा जो कुछ भी समाज में देखता या करता है, उसकी पहली नींव घर में ही पड़ती है। माता-पिता का आपस में व्यवहार, उनका बातचीत का तरीका और नैतिक मूल्य ही बच्चों के अवचेतन मन में बैठते हैं। ·        ·        भ...

#राजनीतिक नैरेटिव, परीक्षा सुधार और भारत की विकास यात्रा: एक महत्वपूर्ण संक्रमण काल की चुनौतियां

Image
  #भूमिका भारत आज अपने आधुनिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। जब दुनिया की अनेक विकसित अर्थव्यवस्थाएं मंदी, महंगाई, ऋण संकट और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं से जूझ रही हैं, तब भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपना स्थान बना चुका है। पिछले एक दशक में आधारभूत संरचना निर्माण, डिजिटल परिवर्तन, वित्तीय समावेशन, विनिर्माण विस्तार, रक्षा आधुनिकीकरण तथा प्रशासनिक सुधारों ने भारत को वैश्विक मंच पर एक नई पहचान दी है। आज भारत केवल एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि वैश्विक विकास का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर सामने आया है। हालांकि, इन उपलब्धियों के समानांतर भारत ऊर्जा सुरक्षा, चालू खाता घाटा (CAD), वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला संबंधी चुनौतियों, मुद्रा अस्थिरता और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों जैसी जटिल चुनौतियों का भी सामना कर रहा है। ऐसे समय में NEET-UG और अन्य राष्ट्रीय परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं तथा पेपर लीक की घटनाओं ने छात्रों और अभिभावकों के बीच स्वाभाविक चिंता पैदा की है। इन चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा प्रश्न भी उभरता है—...

चुप रहिए कोई सुन लिया या देख लिया तो ? | जब पीड़ित अकेला पड़ जाए | क्या परिवार, समाज और पुलिस सिर्फ मूक दर्शक हैं?

Image
  करीब तीन दशक पहले आई फिल्म दमिनी (1993) ने पूरे देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था। इस कहानी में एक बहादुर महिला , दमिनी , अपने घर की नौकरानी के साथ हुए बलात्कार की सच्चाई जानने के बाद — अपने ही परिवार के विरुद्ध खड़ी होती है। अपने पति और एक जुझारू वकील की मदद से वह अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाती है , भले ही पूरा समाज उसके सामने खड़ा हो जाए। दमिनी सिर्फ एक फिल्म नहीं थी — यह उन सैकड़ों घरों का प्रतिबिंब थी जहां अन्याय होता है , और अक्सर कोई कुछ नहीं कहता। आज भी ऐसे सैकड़ों दमिनी जैसे संघर्ष देशभर में दोहराए जा रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि जहाँ पहले अधिकतर पीड़ित महिलाएं थीं , आज पुरुष भी घरेलू हिंसा , मानसिक नियंत्रण और सामाजिक उपेक्षा का शिकार बन रहे हैं ।   परिवारजन : समर्थन या चुप्पी ? जब किसी व्यक्ति के साथ घर में ही शोषण होता है — चाहे वह महिला हो या पुरुष — सबसे पहले उसे अपने निकटतम रिश्तेदारों से उम्मीद होती है। ...